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Dr. Rajan Ravichandran मशहूर नेफ़रॉलाजिस्ट (गुर्दारोग विशेषज्ञ)
डा. राजन रविचन्द्रन कहते हैं

"मधुमेह और उच्च रक्तचाप, जीर्ण गुर्दा रोग (क्रानिक किडनी डिसीज़ सी के डी) की ओर ले जा सकते हैं " >>
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जीर्ण गुर्दा रोग (सी.के.डी) में आहार

जीर्ण गुर्दा रोग मरीज़ों में आहार का बदलता स्वरूप

परम्परागत रूप से आहार किसी भी रोग में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी भी चिकित्सा समस्या में मरीज़ का पहला संदेह है मुझे क्या खाना चाहिये? गुर्दा रोग के मरीज़ों के आहार को समझने के लिये, हमें संक्षेप में पहले गुर्दे के कार्य को समझना चाहिये।

  • मूलत: गुर्दे चयापचय के अवशेषों को शरीर से बाहर निकालते हैं। जो खाना हम खाते हैं, उसका मूल भागों में विभाजन होता है जिसके अवशोषण से शरीर में उर्जा का उत्पादन होता है। खाने का सबसे मुख्य हिस्सा, जैसे प्रोटीन, विभाजन के बाद अमैनो तेज़ाब में परिवर्तित हो जाता है जिसका अंतिम उत्पाद है अमोनिया। अमोनिया जिगर द्वारा यूरिया में परिवर्तित हो जाता है और इस यूरिया को गुर्दे शरीर से बाहर निकालते हैं। इसी तरह, प्रोटीन, विशेषतः पशु प्रोटीन, तेज़ाब का उत्पादन करते हैं जिन्हें भी गुर्दे मलत्याग करते हैं। इसी वजह से, जब गुर्दे ठीक से काम नही करते, तब खून में यूरिया का स्तर बढ़ जाता है और शरीर में तेज़ाब का संग्रह हो जाता है।


  • गुर्दों का दूसरा कार्य है शरीर के आंतरिक वातावरण में तेज़ाब-क्षार इलेक्ट्रोलाइट्स और पानी के बीच संतुलन बनाये रखना। यह गुर्दों की जिम्मेदारी है कि सही तरीके से पानी की सही मात्रा शरीर से बाहर निकाले ताकि न तो बदन निर्जलित हो और न ही बदन फूले। इसी तरह, आहार में हम स्वाद बढ़ाने के लिये बहुत नमक (सोडियम क्लोराइड़) इस्तेमाल करते हैं और यहाँ भी गुर्दों की ही जिम्मेदारी होती है कि अतिरिक्त नमक को शरीर से बाहर निकाले ताकि हमें उच्च रक्तचाप न हो। प्राकृतिक खाद्य पदार्थ में पोटेशियम सहित विविध खनिज पदार्थ पाये जाते हैं जिनका मलत्याग गुर्दों द्वारा ही होता है।

प्रोटीन खपत

ऐतिहासिक दॄष्टि से, गुर्दा रोग के मरीजों को प्रथम सलाह चावल-आलू आहार की दी जाती थी। इसका आधार यह परिकल्पना थी कि जितना हो सके प्रोटीन टालना चाहिये और मरीजों को कार्बोहैड्रेट्स द्वारा उर्जा मिलनी चाहिये। इससे यूरिया के उत्पादन में कमी आयेगी।

इसी तरह, जवार को भी एक मुख्य खाद्य समूह माना गया क्योंकि जवार पूर्ण रूप से कार्बोहैड्रेट है। बाद में मरीजों को शाकाहारी और पशु प्रोटीन सहित २० ग्राम प्रोटीन लेने की अनुमति दी गई। इन आहारों की कमी यह थी कि यूरिया का स्तर नीचे गिरने से मरीज कुपोषित होने लगे और जीवनशैली अस्वस्थ होने लगी। इसलिये प्रोटीन के बारे में वर्तमान अवधारणा खास कर पश्चिमी आहार के लिये लागू होती है जिसमें प्रति दिन ४० से ५० ग्राम प्रोटीन होता है। शाकाहारी आहार में उतना प्रोटीन नहीं है जिसकी वजह से प्रोटीन खपत पर प्रतिबन्ध ज़रूरी हो। इसलिये जो सामान्य भारतीय शाकाहारी आहार है वह गुर्दा रोगियों के लिये समुचित है। मरीज़ तीक्ष्ण गुर्दा रोग से पीड़ित हैं या जीर्ण गुर्दा रोग से पीड़ित हैं, यह अंतर जानना बहुत महत्वपूर्ण है। तीक्ष्ण गुर्दा रोग में गुर्दों के काम करने में अल्पकालिक विराम के कारण मरीज़ के आरोग्य प्राप्ति के लिये सुपोषण बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिये प्रोटीन खपत पर प्रतिबन्ध का समर्थन नहीं किया जाता है। मगर जीर्ण गुर्दा रोग में, जहाँ गुर्दे अपरिवर्तनीय ढंग से बिगड़ गये हैं, प्रोटीन (खास कर पशु प्रोटीन) खपत को ४० ग्राम प्रति दिन तक सीमित रखना, रोग की प्रारंभिक अवस्था में रोग के वर्धन में रुकावट डालने के लिये ज़रूरी है। जब बीमारी बढ़ जाती है, तब प्रोटीन प्रतिबन्ध उचित नहीं है क्योंकि मरीज़ अल्पपोषित हो जायेंगे।

नमक खपत

आम लोगों में यह भ्रम होता है कि नमक और यूरिया एक ही है; नमक यूरिया नहीं बल्कि सोडियम क्लोराइड है। हर मरीज़ जिसे गुर्दा रोग है, उसे नमक प्रतिबन्ध की आवश्यकता नहीं होती है। सिर्फ जिनके पैरों में सूजन हो, उन्हें ही नमक प्रतिबन्ध की ज़रूरत होती है। नमक विकल्प पदार्थ (नमक की जगह इस्तेमाल किये जानेवाले पदार्थ) खतरनाक हो सकते हैं क्योंकि उनमें पोटेशियम शामिल होता है।

पानी खपत

यह एक ग़लतफ़हमी है कि पानी की बड़ी मात्रा पीने से गुर्दे बेहतर काम करेंगे। जबकि वो मरीज़ जिनके गुर्दे विफल हो गये हैं, उनके बदन में पानी जमा हो जाता है जिसका नतीज़ा होता है हैपोनेट्रीमिया। इसलिये पानी या तरल पदार्थ का प्रतिबन्ध हर मरीज़ के लिये अलग अलग होता है, यह महत्वपूर्ण है।

पोटेशियम खपत

लगभग सभी मरीज़ों को जिनमें गुर्दे विफल हो गये हैं, पोटेशियम प्रतिबन्ध की आवश्यकता है। फलों का जूस, नारियल पानी, सूखे फल, लाल मांस, इत्यादि में पोटेशियम बड़ी मात्रा में पाया जाता है।

पथरी का रोग

जिन मरीजों के गुर्दों में पथरी हो, उन्हें भी आहार में परिवर्तन की ज़रूरत होती है। अधिकांशतः पथरी कैल्शियम आक्सलेट की पथरी होती हैं, इसलिये पहले पहल कम कैल्शियम और आक्सलेटवाला आहार की सलाह दी जाती थी। लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि कैल्शियम प्रतिबन्ध उलटे हड्डियों में कैल्शियम कम कर देता है और पथरी का निर्माण भी जारी रहता है। इसलिये कम कैल्शियमवाले आहार की सलाह नहीं दी जाती। इसी तरह, टमाटर की वजह से पथरी निर्माण होता है यह भी एक ग़लतफ़हमी है। यह देखा गया है कि आहार में प्रोटीन ज़्यादा होने से यूरिक एसिड का संचय होता है और पेशाब भी अधिक अम्लीय (एसिडिक) होता है। इसकी वजह से पथरी का निर्माण होता है। साथ ही, आहार में अधिक नमक होने से, यह कैल्शियम को सोडियम के साथ खींचकर, पथरी निर्माण करता हैः इसलिये उन मरीजों को जिनके गुर्दों में पथरी हो, कम प्रोटीन और कम नमकवाले आहार आधुनिक सलाह है। अम्लीय पेशाब जलन पैदा करता है, खास कर जब मूत्र पथ का संक्रमण हो। ऐसे आहार जिसमें बडी मात्रा में सब्जियाँ हो, उससे पेशाब क्षारीय (एल्केलाइन) बनता है जिससे जलन से राहत मिलती है।

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